शून्य का अविष्कार किसने और कब किया?

शून्य अर्थात जीरो गणित का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है भारतीय अंक पद्धति(1,2,3..) के साथ 0 अंक लग जाने पर कितनी भी बड़ी संख्या लिखी जा सकती है. इतना समझ लीजिए यदि शून्य (0) ना होता है तो गिनती संभव ही ना थी. और इस बड़े अविष्कार का श्रेय भारत के गणितज्ञों को जाता है. जिन्होंने पहले भारतीय अंक पद्धति का निर्माण करके दुनिया को अंक प्रदान किए और फिर जीरो के इस्तेमाल का सही ज्ञान देकर गणित को और मजबूत किया.

जीरो का आविष्कार

जीरो का ज्ञान वेदों की तरह आदिकाल से मौजूद है. शून्य का इस्तेमाल सर्वप्रथम भारत से शुरू हुआ. जैसे की गीता में 18 अध्याय है और 18 बिना 10 की गिनती पार किए नहीं जाना जा सकता. सहस्र यानी 1000 योजन पर चंद्रमा है यह दूरी सबसे पहले भारतीय पुस्तकों में मिली, एक हजार की संख्या भी बिना शुन्य के प्रयोग नहीं बन सकती. भारत से टूटकर बने हुए देशों के अलावा किसी भी देश में सबसे पहले इसका प्रयोग नहीं हुआ. जिसका सीधा सा अर्थ है 0 भारतीय ज्ञान है.

सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट्ट ने आर्यभटीय ([ संख्यास्थाननिरूपणम् ]) में कहा है-

एकं च दश च शतं च सहस्रं तु अयुतनियुते तथा प्रयुतम्। कोट्यर्बुदं च वृन्दं स्थानात्स्थानं दशगुणं स्यात् ॥ २ ॥

अर्थात् “एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद तथा बृन्द में प्रत्येक पिछले स्थान वाले से अगले स्थान वाला दस गुना है।” और यही संख्या के दशमलव सिद्धान्त का अविष्कार भी रहा.

भारत से विकसित हुआ 0 शून्य और संख्या का ज्ञान सबसे पहले अरब में पहुंचा और वहां पर इसे सिफर के नाम से प्रचलित किया गया. इसके बाद लैटिन और अंग्रेजी में जीरो के नाम से प्रचलित हुआ. आर्यभट्ट के द्वारा जीरो का प्राचीन भारतीय संख्या ज्ञान दुनिया भर में विख्यात हुआ था इसीलिए आर्यभट्ट को 0 की खोज करने वाला माना जाता है.

हम सब जानते हैं कि खोज करने का अर्थ अविष्कार करना नहीं होता. भारतीय संख्या पद्धति जिसे आप 1, 2, 3…9 कहते हैं और अपने जीवन में प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं यह दुनिया को भारत के द्वारा मिला हुआ एक बड़ा वरदान साबित हुआ है.

निष्कर्ष

शुन्य शुद्ध भारतीय ज्ञान है और आर्यभट्ट ने एक अध्यापक की तरह इस ज्ञान के बारे में अपनी पुस्तक के द्वारा जानकारी प्रदान की थी.

इस लेख में आपको जीरो का आविष्कार किसने किया शुन्य का महत्व और शुन्य के इतिहास के बारे में जानकारी मिली. अपने इस जानकारी को सहेज कर रखें, और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें.

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3 Comments
  1. रजनीकांत says

    आर्य भट्ट एक महान अध्यापक थे… हमें गर्व है आर्य हिन्दू समाज पर.
    भारत का वैदिक ज्ञान सबसे प्रथम और सबसे महान.

  2. रॉकी सेन says

    जब 1, 2, 3,… 9 हमारे पूर्वजो यानि भारतियों ने बनायीं और 10 से आगे की गिनती का उपयोग दुनिया के सबसे पुरानी संस्कृत पुस्तकों में ही सबसे पहले है, तो सीधी सी बात है शुन्य का ज्ञान सबसे पहले हमारे लोगो ने ही बनाया.

    aryabhatt ने एक अच्छे अध्यापक की तरह एस ज्ञान को सभी को समझाया था. इसीलिए उन्हें शुन्य का खोजकर्ता कहा जाता है, और आर्य भट्ट भी एक वैदिक धर्मी हिन्दू आर्य ही तो थे.

  3. सोनम शुक्ला says

    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने, धन्यवाद.

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